चल रहे दफ़्तर हैं अफ़सर सो रहे हैं
खिड़कियाँ हैं जागती दर सो रहे हैं
सोख लेते हैं ये तकिए आँसुओं को
मुतमइन हो के सो बिस्तर सो रहे हैं
ऐन मुमकिन है कोई तूफ़ान आए
एक अरसे से समुंदर सो रहे हैं
ये नहीं है वक़्त हमला बोलने का
देखिए उस पार लश्कर सो रहे हैं
कुछ नहीं मालूम कब उठ जाए ये फिर
दर्द जो सीने के अंदर सो रहे हैं
ख़्वाब में भी अश्क ही आएँगे अब तो
मीर का दीवान पढ़ कर सो रहे हैं
— Dipendra Singh 'Raaz'















