ज़बान बंद रखें और तुम से डर जाएँ
ये बात ज़ेहन में आने से क़ब्ल मर जाएँ
मुआ'फ़ी माँगने जाएँ ख़ुदा के घर लेकिन
ख़ता हरम में हुई हो तो फिर किधर जाएँ
मैं अब बदल नहीं सकता मिज़ाज जीने का
अब आप चाहें तो ठहरें वगर्ना घर जाएँ
बहार-ए-नौ में नए गुल तो खिल रहे हैं मगर
झड़ी हैं शाख़ से जो पत्तियाँ किधर जाएँ
वो जान-बूझ के नाख़ुन बढ़ा के रखते हैं
ये चाहते ही नहीं हैं कि ज़ख़्म भर जाएँ
मिला है तख़्त जो जम्हूरियत में बानर को
तो उन से क्या सभी जंगल के शे'र डर जाएँ
— Ehya Bhojpuri















