ग़म का मारा कभी न हो कोई
बे-सहारा कभी न हो कोई
जब हर इक शख़्स हो फ़क़त दरिया
जब किनारा कभी न हो कोई
गर कभी हो तो हो फ़क़त तश्बीह
इस्तिआ'रा कभी न हो कोई
क्यूँँ भला इस तरह तबीअ'त हो
क्यूँँ गवारा कभी न हो कोई
तू कि इक 'उम्र इंतिज़ार करे
और इशारा कभी न हो कोई
इस क़दर हूँ तही ख़ुदा न करे
जब ख़सारा कभी न हो कोई
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Farhat Abbas Shah
our suggestion based on Farhat Abbas Shah
As you were reading Samundar Shayari Shayari