तुम्हारे ख़्वाब मिरे साथ साथ चलते हैं

कई सराब मिरे साथ साथ चलते हैं

तुम्हारा ग़म ग़म-ए-दुनिया उलूम-ए-आगाही
सभी अज़ाब मिरे साथ साथ चलते हैं

इसी लिए तो मैं उर्यानियों से हूँ महफ़ूज़
बहुत हिजाब मिरे साथ साथ चलते हैं

न जाने कौन हैं ये लोग जो कि सदियों से
पस-ए-नक़ाब मिरे साथ साथ चलते हैं

मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ
तो कुछ सहाब मिरे साथ साथ चलते हैं

— Farhat Abbas Shah

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