सर-ए-सहरा-ए-दुनिया फूल यूँँ ही तो नहीं खिलते
दिलों को जीतना पड़ता है तोहफ़े में नहीं मिलते
ये क्या मंज़र है जैसे सो गई हों सोच की लहरें
ये कैसी शाम-ए-तन्हाई है पत्ते तक नहीं हिलते
मज़ा जब था कि बोतल से उबलती फैलती रुत में
धुआँ साँसों से उठता गर्म बोसों से बदन छिलते
जो भर भी जाएँ दिल के ज़ख़्म दिल वैसा नहीं रहता
कुछ ऐसे चाक होते हैं जो जुड़ कर भी नहीं सिलते
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Fuzail Jafri
our suggestion based on Fuzail Jafri
As you were reading Basant Shayari Shayari