मैं ऐसी नफ़्सियात में रहता हूँ आजकल

जैसे किसी हयात में रहता हूँ आजकल

वस्ल-ए सनम न तर्क-ए-त'अल्लुक़ की फ़िक्र है
ऐ बात किस ज़मात में रहता हूँ आजकल

कुछ ऐसे ऐसे शख़्स से घुल मिल गया हूँ मैं
औकात पार ज़ात में रहता हूँ आजकल

गर्द-ए-मलाल से तो यूँ दम घुटता है मिरा
गोया बड़ी ज़कात में रहता हूँ आजकल

वो वो मुआमला तो मुहब्बत का था मगर
मैं वैसे एहतियात में रहता हूँ आजकल

— gabruu govind

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