shaam se aaj saans bhari hai | शाम से आज सांस भारी है

  - Gulzar

शाम से आज सांस भारी है
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है

आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है

रात को दे दो चांदनी की रिदा
दिन की चादर अभी उतारी है

शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
कैसी चुप सी चमन में तारी है

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्तां हमारी है

  - Gulzar

Shaam Shayari

Our suggestion based on your choice

    अजब अंदाज़ के शाम-ओ-सहर हैं
    कोई तस्वीर हो जैसे अधूरी
    Asad Bhopali
    18 Likes
    बाक़ी सारे काम भुलाकर इश्क़ किया
    सुबह से लेकर शाम बराबर इश्क़ किया

    ग़लती ये थोड़े थी इश्क़ किया हम ने
    ग़लती ये थी ग़ैर बिरादर इश्क़ किया
    Read Full
    Vashu Pandey
    27 Likes
    'मीर' से बैअत की है तो 'इंशा' मीर की बैअत भी है ज़रूर
    शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो
    Ibn E Insha
    20 Likes
    शाम थी हिज्र की हाल मत पूछना
    आँख थकने लगे तो जिगर रो पड़े
    Piyush Mishra 'Aab'
    अभी तो शाम की दस्तक हुई है
    अभी से लग गया बिस्तर हमारा

    यही तन्हाई है जन्नत हमारी
    इसी जन्नत में है अब घर हमारा
    Read Full
    Vikas Sharma Raaz
    35 Likes
    शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
    मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
    Rajesh Reddy
    48 Likes
    हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे
    हमको भी हालात ने बाहर भेजा है
    Zahid Bashir
    90 Likes
    ये शाम ख़ुशबू पहन के तेरी ढली है मुझमें जो रेज़ा रेज़ा
    मैं क़तरा क़तरा पिघल रही हूँ ख़मोश शब के समन्दरों में
    Kiran K
    बुलाया शाम को लेकिन वहाँ मैं सुबह जा बैठा
    सुना था देर से आना उसे अच्छा नहीं लगता
    Krishnakant Kabk
    30 Likes
    ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
    जैसे जंगल है रास्ता भी है

    यूँ तो वादे हज़ार करता है
    और वो शख्स भूलता भी है

    हम को हर सू नज़र भी रखनी है
    और तेरे पास बैठना भी है

    यूँ भी आता नहीं मुझे रोना
    और मातम की इब्तिदा भी है

    चूमने हैं पसंद के बादल
    शाम होते ही लौटना भी है
    Read Full
    Karan Sahar

More by Gulzar

As you were reading Shayari by Gulzar

    पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं
    शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं

    नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ
    और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं

    चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया
    लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं

    कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग
    उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं

    वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने
    और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं

    रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं
    हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं

    जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल
    कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं
    Read Full
    Gulzar
    शाम से आँख में नमी सी है
    आज फिर आप की कमी सी है
    Gulzar
    49 Likes
    कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
    ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

    बज़्म-ए-याराँ में रहता हूँ तन्हा
    और तंहाई बज़्म लगती है

    अपने साए पे पाँव रखता हूँ
    छाँव छालों को नर्म लगती है

    चाँद की नब्ज़ देखना उठ कर
    रात की साँस गर्म लगती है

    ये रिवायत कि दर्द महके रहें
    दिल की देरीना रस्म लगती है
    Read Full
    Gulzar
    मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता
    मगर चराग़ की सूरत जला दिया होता

    न रौशनी कोई आती मिरे तआ'क़ुब में
    जो अपने-आप को मैं ने बुझा दिया होता

    ये दर्द जिस्म के या-रब बहुत शदीद लगे
    मुझे सलीब पे दो पल सुला दिया होता

    ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
    वगर्ना ज़िंदगी ने तो रुला दिया होता
    Read Full
    Gulzar
    हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
    वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
    Gulzar
    33 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Gulzar

Similar Moods

As you were reading Shaam Shayari Shayari