hamaare ahd ka manzar ajeeb manzar hai | हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है

  - Hafeez Banarasi

हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है
बहार चेहरे पे दिल में ख़िज़ाँ का दफ़्तर है

न हम-सफ़र न कोई नक़्श-ए-पा न रहबर है
जुनूँ की राह में कुछ है तो जान का डर है

हर एक लम्हा हमें डर है टूट जाने का
ये ज़िंदगी है कि बोसीदा काँच का घर है

इसी से लड़ते हुए एक 'उम्र बीत गई
मेरी अना ही मेरे रास्ते का पत्थर है

तमाम जिस्म हैं जिस के ख़याल में लर्ज़ां
वो तीरगी का नहीं रौशनी का ख़ंजर है

मैं एक क़तरा हूँ लेकिन मेरा नसीब तो देख
कि बे-क़रार मेरे ग़म में इक समुंदर है

उसी के पीछे रवाँ हूँ मैं पागलों की तरह
वो एक शय जो मेरी दस्तरस से बाहर है

इसी ख़याल से मिलता है कुछ सुकूँ दिल को
कि ना-सुबूरी तो इस दौर का मुक़द्दर है

कभी तो इस से मुलाक़ात की घड़ी आए
जो मेरे दिल में बसा है जो मेरे अंदर है

उक़ाब-ए-ज़ुल्म के पंजे अभी कहाँ टूटे
अभी तो फ़ाख़्ता-ए-अमन ख़ून में तर है

ख़ुदा की मार हो इस जेहल-ए-आगही पे 'हफ़ीज़'
ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद यहाँ हर शख़्स इक पयम्बर है

  - Hafeez Banarasi

Andhera Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Hafeez Banarasi

As you were reading Shayari by Hafeez Banarasi

Similar Writers

our suggestion based on Hafeez Banarasi

Similar Moods

As you were reading Andhera Shayari Shayari