अदा परियों की सूरत हूर की आँखें ग़ज़ालों की
ग़रज़ माँगे की हर इक चीज़ है इन हुस्न वालों की
बजाए-रक़्स मय-ख़ाने में है गर्दिश प्यालों की
तकल्लुफ़-बर-तरफ़ ये बज़्म है अल्लाह वालों की
निशाँ जब मिट गया तुर्बत का आए फ़ातिहा पढ़ने
उन्हें कब याद आई हैं वफ़ाएँ मरने वालों की
हुआ दो गज़ कफ़न मुनइम को हासिल माल-ए-दुनिया से
बंधी रक्खी ही आख़िर रह गई गठरी दोशालों की
दुखा कर दिल मिरा फिर आप ही उज़्र-ए-जफ़ा करना
अरे काफ़िर तिरी इक चाल है ये लाख चालों की
अभी तुम को बहुत कुछ नाज़ है तिरछी निगाहों पर
मगर देखी नहीं तासीर तुम ने मेरे नालों की
तिरे होते हुए ये बात ग़ैरत की है ओ ज़ालिम
उड़ाए आसमाँ यूँँ ख़ाक तेरी पाएमालों की
भले हैं या बुरे जो कुछ हैं बंदे तो ख़ुदा के हैं
नदामत इस क़दर वाइज़ न कर मय-ख़ाने वालों की
हुई बौछार मुझ पर शिकवा-ए-बेजा की फिर क्या क्या
जहाँ छेड़ा उन्हें बस खुल गई गठरी मलालों की
गुनहगार-ए-मोहब्बत हैं जिधर गुज़़रेंगे महशर में
हमारे साथ साथ इक भीड़ होगी ख़ुश-जमालों की
फ़रिश्तों से 'हफ़ीज़' इक दिन लहद में गुफ़्तुगू होगी
अभी से फ़िक्र लाज़िम है तुम्हें उन के सवालों की
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