अब तो नहीं आसरा किसी का
ओ आँख बदल के जाने वाले
कुछ ध्यान किसी की आजिज़ी का
बीमार को दीजिए तसल्ली
ये वक़्त नहीं जली-कटी का
आपस में हुई जो बद-गुमानी
मुश्किल है निबाह दोस्ती का
बालीं से कोई उठा ये कह कर
अंजाम ब-ख़ैर हो किसी का
ग़म का भी क़याम कुछ न ठहरा
रोना क्या रोइए ख़ुशी का
पहुँचा ही दिया किसी गली तक
अल्लाह-रे ज़ोर बे-ख़ुदी का
— Hafeez Jaunpuri














