दोस्त दुश्मन ने किए क़त्ल के सामाँ क्या क्या
जान-ए-मुश्ताक़ के पैदा हुए ख़्वाहाँ क्या क्या
आफ़तें ढाती है वो नर्गिस-ए-फ़त्ताँ क्या क्या
दाग़ देती है मुझे गर्दिश-ए-दौराँ क्या क्या
फिर सकी मेरे गले पर न छुरी है ज़ालिम
वर्ना गर्दूं से हुए कार-ए-नुमायाँ क्या क्या
हुस्न में पहलू-ए-ख़ुर्शीद मगर दाबेगा
दूर खिंचता है हमारा मह-ए-ताबाँ क्या क्या
रू-ए-दिलबर की सफ़ा से था बड़ा ही दा'वा
सामने हो के हुआ आइना हैराँ क्या क्या
आँखें गेसू के तसव्वुर में रहा करती हैं बंद
लुत्फ़ दिखलाता है ये ख़्वाब-ए-परेशाँ क्या क्या
गर्दिश-ए-चश्म दिखाता है कभी गर्दिश-ए-जाम
मेरी तदबीर में फिरता है ये दौराँ क्या क्या
चश्म-ए-बीना भी अता की दिल-ए-आगह भी दिया
मेरे अल्लाह ने मुझ पर किए एहसाँ क्या क्या
दोस्त ने जब न दम-ए-ज़ब्ह सिसकता छोड़ा
मेरे दुश्मन हुए हँस हँस के पशेमाँ क्या क्या
गर्दिश-ए-नर्गिस-ए-फ़त्ताँ ने तो दीवाना किया
देखो झंकवाए कुएँ चाह-ए-ज़नख़दाँ क्या क्या
जल गया आग में आप अपने मैं मानिंद-ए-चिनार
पीसते रह गए दाँत अर्रा-ओ-सोहाँ क्या क्या
कुछ कहे कोई मैं मुँह देख के रह जाता हूँ
कम दिमाग़ी ने किया है मुझे हैराँ क्या क्या
गर्म हरगिज़ न हुआ पहलू-ए-ख़ाली बे-यार
याद आवेगी मुझे फ़स्ल-ए-ज़मिस्ताँ क्या क्या
कोई मरदूद-ए-ख़लाइक़ नहीं मुझ सा 'आतिश'
क्या कहूँ कहते हैं हिंदू-ओ-मुसलमाँ क्या क्या
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