तलाश-ए-रिज़्क़ में रस्ते पे चलते रहते हैं
मगर ये तौर-तरीक़े बदलते रहते हैं
वफ़ा के नाम पे धोखे जो खाता रहता हूँ
मिरे ये ज़ख़्म मुझी को ही खलते रहते हैं
नज़र में दर्द भी चेहरे पे मुस्कुराहट भी
बिखर के ख़ुद ही यहाँ हम सँभलते रहते हैं
तू इन की फ़िक्र न कर हाल-ए-दिल सुना अपना
हमारी आँख से आँसू निकलते रहते हैं
तुझे भुलाने की कोशिश हज़ार की 'रेहान'
तिरे ख़याल मगर दिल में पलते रहते हैं
— REHAN KHAN















