उसने दो चार कर दिया मुझको
ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझको
क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे
क्यूँ तलबगार कर दिया मुझको
कभी पत्थर कभी ख़ुदा उसने
चाहा जो यार कर दिया मुझको
उस सेे कोई सवाल मत करना
उसने इंकार कर दिया मुझको
एक इंसान ही तो माँगा था
उसको भी मार कर दिया मुझको
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Himanshi babra KATIB
our suggestion based on Himanshi babra KATIB
As you were reading Aadmi Shayari Shayari