zehan men baat jo bhi thii bataa dete to achha tha | ज़ेहन में बात जो भी थी बता देते तो अच्छा था

  - Abhinav Baishander

ज़ेहन में बात जो भी थी बता देते तो अच्छा था
जो कुछ कहना सुनाना था सुना देते तो अच्छा था

सभी शिकवे गिले तेरे ज़माने से हुए मालूम
शिक़ायत मुझ सेे थी मुझको बता देते तो अच्छा था

मुहब्बत तुमने दफ़ना कर हयात-ए-हिज्र अपनायी
तो अब क्यूँँ सोचते हो तुम जता देते तो अच्छा था

शब-ए-तन्हा में गुज़री 'उम्र पर आँसू बहाना क्या
कलेजा चीरकर अपना दिखा देते तो अच्छा था

किए वादे कई तुमने सफ़र की इब्तिदा में पर
वो इक वा'दा मुहब्बत का निभा देते तो अच्छा था

मलामत कर रहे हो चीखते हो अब गुनाहों पर
गुनाह को देखते ही ग़ुल मचा देते तो अच्छा था

सभी मुजरिम नहीं थे क़ैद थे जो क़ैदखानों में
जो मुज़रिम थे उन्हीं को तुम सज़ा देते तो अच्छा था

बहुत पछता रहे हैं सोचते हैं नस्लें बच जातीं
अगर सच से उन्हें वाकिफ़ करा देते तो अच्छा था

  - Abhinav Baishander

Safar Shayari

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