जिस रोज़ हमारा कूच होगा

फूलों की दुकानें बंद होंगी
शीरीं-सुख़नों के हर्फ़-ए-दुश्नाम
बे-मेहर ज़बानें बंद होंगी

पलकों पे नमी का ज़िक्र ही क्या
यादों का सुराग़ तक न होगा
हमवारी-ए-हर-नफ़्स सलामत
दिल पर कोई दाग़ तक न होगा
पामाली-ए-ख़्वाब की कहानी
कहने को चराग़ तक न होगा

माबूद इस आख़िरी सफ़र में
तन्हाई को सुर्ख़-रू ही रखना
जुज़ तेरे नहीं कोई निगह-दार
उस दिन भी ख़याल तू ही रखना
जिस आँख ने उम्र भर रुलाया
उस आँख को बे-वज़ू ही रखना

जिस रोज़ हमारा कूच होगा
फूलों की दुकानें बंद होंगी

— Iftikhar Arif

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