बाइस-ए-इज़्तिराब ख़ामोशी
इक मुसलसल अज़ाब ख़ामोशी
गुफ़्तुगू है अभी हमा-तन-गोश
कर रही है ख़िताब ख़ामोशी
किस क़दर दिल ख़राश है मत पूछ
ख़ामुशी का जवाब ख़ामोशी
सारे लफ़्ज़ों ने साथ छोड़ दिया
जब हुई बारयाब ख़ामोशी
ख़ुश-बयानी का ज़ो'म ख़त्म हुआ
कर गई ला-जवाब ख़ामोशी
इक तरफ़ पुर-कशिश मिरे अशआर
इक तरफ़ इज्तिनाब ख़ामोशी
उन के होंटों पे कुछ नहीं 'राग़िब'
हो गई बे-नक़ाब ख़ामोशी
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Iftikhar Raghib
our suggestion based on Iftikhar Raghib
As you were reading Aawargi Shayari Shayari