है काँटों का जंगल गुलिस्ताँ नहीं है

न कीजे मोहब्बत ये आसाँ नहीं है

हकी़क़त नहीं है छलावा मोहब्बत
समझता है सब कुछ जो नादाँ नहीं है

नहीं है वो माफ़ी के लाइक़ ज़रा भी
ख़ता पे जो अपनी पशेमाँ नहीं है

पसीने से लथपथ जो बैठा हुआ है
वो हारा हुआ है परेशाँ नहीं है

नहीं थी किसी से कोई आस उस को
नकारा गया है तो हैराँ नहीं है

बहन बेटियों की जो इज़्ज़त उछाले
नहीं है नहीं है वो इन्साँ नहीं है

ज़बाँ से तो कहता है मोमिन वो खु़द को
'अमल कह रहा है मुसलमाँ नहीं है

— S M Afzal Imam

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