फिर न कोई मिली तुझ सेी चंचल मुझे
कर सके अपने पीछे जो पागल मुझे
है ये मेरा भरम तो भरम ही सही
याद तू ने किया है मुसलसल मुझे
मैं जो तुझ को मिला तू मुकम्मल हुआ
और तू ने किया फिर मुकम्मल मुझे
अब भी हैरत में हूँ उस ने सौंपा है ख़ुद
आँख आँसू हया और काजल मुझे
उस की चाहत का मैं ने भरम रख लिया
जब कहा कर गई है वो घाइल मुझे
यार अफ़ज़ल मैं इतना भी अच्छा नहीं
मानते जितना हैं लोग अफ़ज़ल मुझे
— S M Afzal Imam















