"वो जितनी ख़ूब-सूरत है"
वो जितनी ख़ूब-सूरत है
उसे क्यूँकर ज़रूरत है
के ज़ुल्फ़ों को सँवारे वो
के आदत को सुधारे वो
लगाए सुर्ख़ी होंटों पर
हो फ़िल्टर जैसे फो़टो पर
के ख़ुद को बारहा देखे
के घण्टों आइना देखे
वो जितनी ख़ूब-सूरत है
उसे क्यूँंकर ज़रूरत है
के लहजा नर्म हो उस का
शराफ़त धर्म हो उस का
के होंटों को ज़रा भींचे
नज़र अपनी रखे नीचे
कोई वा'दा निभाये वो
किसी से दिल लगाए वो
वो जितनी ख़ूब-सूरत है
उसे क्यूँंँकर ज़रूरत है
— S M Afzal Imam















