मैं किसी उजले गुलाबी दिन को

अपनी बंद मुठ्ठी खोल दूँगा
रख दूँगा चुप-चाप एक लफ़्ज़
तुम्हारी दुधिया सी हथेली पर

जो ख़ुश्बू नहीं होगा
फिर भी महकेगा
चांदनी नहीं होगा
फिर भी चमकेगा
नशा नहीं होगा
फिर भी बहकेगा

तुम उस लफ़्ज़ को चुप-चाप भरना चाहोगी
हाथों की लकीरों में
नहीं भर पाओगी मगर
फिर भी
वो उस लफ़्ज़ बस जाएगा तुम्हारी नस नस में मैं किसी उजले गुलाबी दिन को
अपने बंद होंठ खोल दूँगा
तुम्हारी रेशमी सी पलकों पर
रख दूँगा धी
में से एक लफ़्ज़
जो नींद नहीं होगा
फिर भी बोझिल होगा
ख़्वाब नहीं होगा
फिर भी नाज़ुक होगा

आँसू नहीं होगा
फिर भी कोमल होगा
वो लफ़्ज़
सोख लेगा तुम्हारी सारी नींदें
उस लफ़्ज से रिस रिस कर
टपकते रहेंगे ख़्वाब
तुम्हारी आँखों में
जिन की ता'बीर ढूंढ़ नहीं पाओगी

तो फिर किसी उजले गुलाबी दिन को
मैं अपनी बंद मुठ्ठी नहीं खोलूंगा
वो एक लफ़्ज़ नहीं बोलूंगा
तुम्हारे सामने बैठ
चुप-चाप
पी जाऊँगा चाय की प्याली में घोल कर
वो एक लफ़्ज़
और उजले गुलाबी दिन को

— Irshaad Kamil

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