हर्फ़ से हर्फ़ जोड़ता हूँ मैं
रुख ख़यालों का मोड़ता हूँ मैं
मसअला है बना-बना कर घर
फिर उसे ख़ुद ही तोड़ता हूँ मैं
शहर में हाल ऐसा है यारो
दर-ब-दर सर ही फोड़ता हूँ मैं
पेड़ की ही तरह ज़मीं का सब
ज़हर उस से निचोड़ता हूँ मैं
है मिरे जो बदन पे चादर कम
सो बदन ही सिकोड़ता हूँ मैं
राह मुश्किल चुनी है ख़ुद पर अब
अपना ही साथ छोड़ता हूँ मैं
— Taufique Habib















