पड़ गए इश्क़ के ख़राबों में
दिल नहीं लग रहा किताबों में
आसमाँ से गिरे समझ आया
थी ज़रूरी ज़मीन ख़्वाबों में
इक ज़माना गुज़र गया पर हम
हैं अभी तक घिरे अज़ाबों में
थे ज़रूरी सवाल हम सारी
उम्र उलझे रहे जवाबों में
वक़्त बीता ख़बर हुई सब को
क्या कमी थी हुई हिसाबों में
— Taufique Habib















