शफ़क़ जब फूल कर रंग-ए-हिना थी

और हवा के लब सिले थे
एक बूढ़ा पेड़ बरगद का
खड़ा गँगा-किनारे
दिल-गिरफ़्ता
ख़ुद से महव-ए-गुफ़्तुगू था
''वो मिरी इक शाख़ का पत्ता
मिरे ही जिस्म का हिस्सा
गिरा
गिर कर सितारा हो गया
पानी का प्यारा हो गया
मुझ से किनारा हो गया''
वहीं सरगोशियों में
इक पतिंगा
गुनगुनाया कान में उस के
निराशा तुम में क्यूँ जागी
मिरे बाबा?
तुम्हारे अंग के कितने ही पत्ते
अब भी गुन गाते तुम्हारा हैं
सहारा तुम बनो उन का
तुम्हारा वो सहारा हैं
न इक पत्ते को रो बाबा!

— Jafar Sahni

More by Jafar Sahni

Other nazm from the same pen

See all from Jafar Sahni →

Badan Shayari

Shers of badan.

All Badan Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling