आसमाँ खींच के धरती से मिला सकता है

मेरी जानिब वो कभी हाथ बढ़ा सकता है

शाह-ज़ादी जो कबूतर है तिरे हाथों में
दो क़बीलों को तसादुम से बचा सकता है

अपने काँधों से उतारा ही नहीं ज़ाद-ए-सफ़र
फिर से हिजरत का मुझे हुक्म भी आ सकता है

चाहता है जो मोहब्बत में तरामीम नई
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिला सकता है

बंद कमरे में है तन्हाई कहाँ तक मेरी
खिड़कियाँ खोल के देखा भी तो जा सकता

कोई कितना भी हो कम-ज़र्फ़-ओ-गुनहगार मगर
एक प्यासे को वो पानी तो पिला सकता है

इस लिए बा'द में उट्ठा हूँ मैं सब से 'साहिर'
वो इशारे से मुझे पास बुला सकता है

— Jahanzeb Sahir

More by Jahanzeb Sahir

Other ghazal from the same pen

See all from Jahanzeb Sahir →

Powerful Protest Shayari

Shers of powerful protest.

All Powerful Protest Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling