guzar gaya jo mire dil pe saanehaa ban kar | गुज़र गया जो मिरे दिल पे सानेहा बन कर

  - Jaleel 'Aali'

गुज़र गया जो मिरे दिल पे सानेहा बन कर
उतर गया वो मिरी रूह में ख़ुदा बन कर

तिरा ख़याल शब-ए-हिज्र फैलता ही गया
हज़ार रंग की सोचों का सिलसिला बन कर

वफ़ा के संग से टकरा के एहतिजाज-ए-अना
सलीब-ए-लब पे सिसकने लगा दुआ बन कर

बदन के दश्त में मन की हसीन सुब्हों को
निकल रहा है ग़म-ए-दहर अज़दहा बन कर

कभी तो दीप जलें गुल खिलें फ़ज़ा महके
कभी तो आ शब-ए-वीराँ में रतजगा बन कर

तमाम 'उम्र जिसे ढूँडते रहे 'आ'ली'
कहीं मिला भी अगर वो तो फ़ासला बन कर

  - Jaleel 'Aali'

Rang Shayari

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