kuchh aur mire dard ke sholoon ko hawa do | कुछ और मिरे दर्द के शो'लों को हवा दो

  - Jaleel 'Aali'

कुछ और मिरे दर्द के शो'लों को हवा दो
बे-नूर हुए दाग़ अँधेरा है ज़िया दो

पीछे ग़म-ओ-अंदोह के फ़िरऔन का लश्कर
आगे अलम-ओ-यास का दरिया है असा दो

मैं दश्त-ए-ग़म-ए-इश्क़ में हँसता हुआ आऊँ
रस्ते से ग़म-ए-दहर की दीवार हटा दो

मैं और सुलगता हुआ सहरा-ए-तजस्सुस
भटका हुआ राही हूँ कोई राह दिखा दो

क्यूँँ मेरी शिकस्तों को सहारा नहीं मिलता
इंसान हूँ मुहताज ख़ुदा का हूँ ख़ुदा दो

इस शहर में जीने की है अब एक ही सूरत
एहसास के मंसूर को सूली पे चढ़ा दो

इस दौर का सुक़रात हूँ सच बोल रहा हूँ
क्या देर है क्यूँँ चुप हो मुझे ज़हर पिला दो

  - Jaleel 'Aali'

Kashmir Shayari

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