'इश्क़ में कोई ऐसा भी अंजाम हो
संग ही सुब्ह और संग ही शाम हो
बद-दुआ उसकी शायद लगी है मुझे
अब दुआ दे कोई मुझको आराम हो
गुफ़्तगू ख़ूब लिख लिख के करते हैं पर
कॉल कर लें अगर उनको इल्हाम हो
उसको दरकार है आजकल प्यार की
या ख़ुदा उसकी नफ़रत मिरे नाम हो
बात लड़कों की करनी है कर लो मगर
इस फ़ज़ीहत में शाइर न बदनाम हो
काश आ जाए वो दौर फिर लौटकर
दोस्तों संग बस जाम पे जाम हो
कोई ऐसी जगह जू'न मिलती नहीं
रिश्वतों के बिना अब जहाँ काम हो
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