ज़रा सी बात को दिल से लगाए बैठी है

मनाऊँ कैसे उसे तमतमाए बैठी है

अब ऐसे कैसे मैं ये माहताब देखूँगा
ख़फ़ा है मुझ से वो और मुँह घुमाए बैठी है

मिली थी मुझ से वो इक शा'इरी की महफ़िल में
तभी से दिल में वो मेरे समाए बैठी है

सिखा रही है मुझे अब वही वफ़ादारी
इधर उधर जो सभी को फँसाए बैठी है

मुझे गिला है मुहब्बत उसे नहीं मुझ से
उधर वो कब से यूँ बत्ती बुझाए बैठी है

— 'June' Sahab Barelvi

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