ज़मीं के टुकड़े किए आसमान बाँटेगा
वो शाह-ए-वक़्त है सारा जहान बाँटेगा
रखे रहेगा वो तीरों पे दस्तरस अपनी
हमारे बीच तो ख़ाली कमान बाँटेगा
जो काट ले गया फ़स्ल-ए-यक़ीन खेतों से
पलट के आएगा शाख़-ए-गुमान बाँटेगा
कतर के पँख हमारे दरों को खोल दिया
ख़बर मिली थी कि ऊँची उड़ान बाँटेगा
कहाँ वो दर्द का रिश्ता रहा सलामत अब
जो हाथ थाम के सारी तकान बाँटेगा
तमाम चेहरे धुआँ हो गए 'तबस्सुम' जब
तो किस के बीच वो शहर-अमान बाँटेगा
— Kahkashan Tabassum















