बिना मंज़िल के कोई रास्ता अच्छा नहीं लगता

किसी के दिल से या'नी खेलना अच्छा नहीं लगता

गुज़रती हैं कई रातें उसी की याद में लेकिन
कभी इक पल भी उस को सोचना अच्छा नहीं लगता

तेरी आवाज़ सुनते ही ख़ुशी से रोने लगती थी
हमें उस माँ का भी अब बोलना अच्छा नहीं लगता

किसी ने आँखों से आँखें मिलाकर ये कहा मुझ से
हमारे बीच में ये आईना अच्छा नहीं लगता

गुज़श्ता साल ऐसे हादसे की ज़द में था 'काविश'
कि इस के बा'द मुझ को वो ख़ुदा अच्छा नहीं लगता

— "Nadeem khan' Kaavish"

More by "Nadeem khan' Kaavish"

Other ghazal from the same pen

See all from "Nadeem khan' Kaavish" →

Khuda Shayari

Shers of khuda.

All Khuda Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling