इक अधूरी शाम का हिस्सा हूँ मैं
ख़ुद को पाने ख़ुद ही अब निकला हूँ मैं
तुझ को आँखों से शिक़ायत है तो सुन
आइने में भी नहीं दिखता हूँ मैं
अपने प्यासे दिल की ठंडक के लिए
यार इक दरिया जला आया हूँ मैं
— "Nadeem khan' Kaavish"
ख़ुद को पाने ख़ुद ही अब निकला हूँ मैं
तुझ को आँखों से शिक़ायत है तो सुन
आइने में भी नहीं दिखता हूँ मैं
अपने प्यासे दिल की ठंडक के लिए
यार इक दरिया जला आया हूँ मैं
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