इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं

लहरों के आइनों में लगातार आप हैं

ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है
बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं

उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए

जिस के लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं
अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म

किस ने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं
कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की

हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं

— Kashif Sayyed

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