इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं
लहरों के आइनों में लगातार आप हैं
ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है
बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं
उसकी ख़मोशियों की बलागत न पूछिए
जिसके लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं
अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म
किसने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं
कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की
हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं
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