प्यार में पड़कर जान बचाना मुश्किल था
और फिर मैं तो बचपन से ही बुज़दिल था
घबराकर मरने की धमकी देता था
वो भी उसको जो के मेरा क़ातिल था
ग़ैर की ख़ातिर था
में दिल अब रोता है
मेरे साथ में शख़्स वो कितना संगदिल था
इन शानों पर सहराओं के आँसू हैं
हर इक को ये सूखा दरिया हासिल था
हम शुरुआत से कीर्ति इस से वाक़िफ़ थे
ना मैं उसके ना वो मेरे क़ाबिल था
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