मिरा लगता नहीं मन अब मुहब्बत में
मगर पगला गए हैं सब मुहब्बत में
तमाशा देख कर चकरा गया हूँ मैं
घुटन होती है रोज़-ओ-शब मुहब्बत में
किसी पर भी यक़ीं होता नहीं है फिर
भरोसा टूट जाए जब मुहब्बत में
सहेली तुम मुहब्बत सोच कर करना
बदन से खेलते हैं अब मुहब्बत में
— Rovej sheikh















