बात कैसे करूँँ रौशनी से
मुझको फ़ुर्सत नहीं तीरगी से
खौफ़ खाता हूँ मैं नौकरी से
दूर जब से हुआ ज़िन्दगी से
चार पैसों का लालच किया था
काश जी लेता मैं मुफ़्लिसी से
आदमी आदमी का है दुश्मन
इसलिए दूर हूँ आदमी से
किस वजह से परेशान हूँ मैं
आप भी पूछते हैं मुझी से
इतने ख़ंजर घुँपे दोस्ती में
इश्क़ सा हो गया दुश्मनी से
बस मुझे याद है मैं नहीं हूँ
बस मैं रोता हूँ मेरी कमी से
मेरा बचपन जो हँसता है मुझ
में
थोड़ा सा हँसता हूँ उस हँसी से
मेरी ये सोच कितनी ग़लत थी
वो मिलेगी मुझे शा'इरी से
सोचता भी हूँ मैं आज कल तो
मिलना हो जाता है क्यूँ उसी से
गर गुज़र जाऊँ मैं आज भी तो
इक सदा आएगी उस गली से
इक नसीहत उसे भूलने की
उसने भिजवाई मुझको किसी से
बेबसी इतनी थी ज़िन्दगी में
ख़ुद-कुशी भी की बेहद ख़ुशी से
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