baat kaise karoon raushni se | बात कैसे करूँँ रौशनी से

  - Kinshu Sinha

बात कैसे करूँँ रौशनी से
मुझको फ़ुर्सत नहीं तीरगी से

खौफ़ खाता हूँ मैं नौकरी से
दूर जब से हुआ ज़िन्दगी से

चार पैसों का लालच किया था
काश जी लेता मैं मुफ़्लिसी से

आदमी आदमी का है दुश्मन
इसलिए दूर हूँ आदमी से

किस वजह से परेशान हूँ मैं
आप भी पूछते हैं मुझी से

इतने ख़ंजर घुँपे दोस्ती में
इश्क़ सा हो गया दुश्मनी से

बस मुझे याद है मैं नहीं हूँ
बस मैं रोता हूँ मेरी कमी से

मेरा बचपन जो हँसता है मुझ
में
थोड़ा सा हँसता हूँ उस हँसी से

मेरी ये सोच कितनी ग़लत थी
वो मिलेगी मुझे शा'इरी से

सोचता भी हूँ मैं आज कल तो
मिलना हो जाता है क्यूँ उसी से

गर गुज़र जाऊँ मैं आज भी तो
इक सदा आएगी उस गली से

इक नसीहत उसे भूलने की
उसने भिजवाई मुझको किसी से

बेबसी इतनी थी ज़िन्दगी में
ख़ुद-कुशी भी की बेहद ख़ुशी से

  - Kinshu Sinha

Berozgari Shayari

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