
मेरे हाथों से तेरा हाथ इक पल छूट जाता है
मुझे अक्सर डरा कर के ये सपना टूट जाता है
यहाँ माँझा लिपटने में लगे रहते सभी अपना
कोई चुपके से आ कर के पतंगे लूट जाता है
— Krishnakant Kabk
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