जीने की बस ज़िम्मेदारी होती है
हर दिन इस की ही तैयारी होती है
इस दुनिया के चक्कर में वो छूट गया
कैसे कह दें दुनिया प्यारी होती है
पक्षी अक्सर उड़ जाते हैं शाखों से
डेरा पेड़ की ज़िम्मेदारी होती है
उस की मर्ज़ी जिस को चाहे बोसा दे
वैसे सबकी दावेदारी होती है
टूटा होता है वो हरदम अंदर से
जिस के अंदर भी फ़नकारी होती है
— Kush Pandey ' Saarang '















