वो जब से दूर है दिल रो रहा है
सुकूँ का अब निशाँ ही खो रहा है
जुदाई भी मुझे मंज़ूर होती
अगर वो कह के मुझ सेे हो रहा है
मैं कोशिश कर रहा हूँ थाम लूँ कुछ
मगर हर पल मुझे ही धो रहा है
कभी लब ख़ामुशी से बोलते हैं
कि दिल अंदर ही अंदर रो रहा है
परिंदा रह गया बस नाम जैसा
जो उड़ना था कहीं अब खो रहा है
As you were reading Shayari by Kushal "PARINDA"
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