कुंज-ए-क़फ़स से पहले घर अपना कहाँ न था

आए यहाँ तो हौसला-ए-आशियाँ न था

तुझ को समझ के ख़्वाब में पहुँचा मैं जिस जगह
देखा जो आँख खोल के तो कुछ वहाँ न था

इक इक क़दम पे अब तो क़यामत की धूम है
आगे तो ये चलन कभी ऐ जान-ए-जाँ न था

ठहरी जो वस्ल की तो हुई सुब्ह शाम से
बुत मेहरबाँ हुए तो ख़ुदा मेहरबाँ न था

क्यूँकर क़सम पे आज मुझे ए'तिबार आए
किस दिन ख़ुदा तुम्हारे मिरे दरमियाँ न था

तोड़ा जो फूल बुलबुल-ए-शैदा के सामने
क्या तेरे दिल में दर्द कुछ ऐ बाग़बाँ न था

— Lala Madhav Ram Jauhar

More by Lala Madhav Ram Jauhar

Other ghazal from the same pen

See all from Lala Madhav Ram Jauhar →

Rose Shayari

Shers of rose.

All Rose Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling