haalaanki pahle din se kaha ja raha hooñ main | हालाँकि पहले दिन से कहा जा रहा हूँ मैं

  - Liaqat Jafri

हालाँकि पहले दिन से कहा जा रहा हूँ मैं
लेकिन कहाँ किसी को सुना जा रहा हूँ मैं

लाचार ओ बद-हवा से घने जंगलों के बीच
दरिया के साथ साथ चला जा रहा हूँ मैं

पछता रहे हैं सब मिरा पिंजर निकाल कर
दीवार में दोबारा चुना जा रहा हूँ मैं

हालाँकि पहले साए से रहती थी कश्मकश
अब अपने बोझ से ही दबा जा रहा हूँ मैं

तेरे सँभालने से भी पकड़ी न मैं ने आग
अब और भी ज़ियादा बुझा जा रहा हूँ मैं

पहले-पहल तो ख़ुद से ही मंसूब थे ये अश्क
अब उस की आँख से भी बहा जा रहा हूँ मैं

ये दिन भी कैसा सख़्त शिकंजा है 'जाफ़री'
अब जिस पे सारी रात कसा जा रहा हूँ मैं

  - Liaqat Jafri

Dariya Shayari

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