मैं कराची की रहने वाली हूँ

इक समुंदर यहाँ पे बहता है
इस समुंदर की मैं भी माही हूँ इश्क़ की राह की मैं राही हूँ
मेरी मंज़िल है इस की ख़ामोशी
मेरी आवाज़ वो समझता है

उस की मौजों से आश्ना हूँ मैं
उस की लहरें भी जानती हैं मुझे
मैं यहाँ रोज़ शाम आती हूँ
अपने ग़म का बयान करने को
ये मिरा हाल-ए-दिल भी सुनता है
और मुझे अपनी भी सुनाता है
हम यहाँ पहरों बात करते हैं
शिकवा-ए-काएनात करते हैं

— Maaham Shah

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