पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है
उसके बाद ही कुछ कारीगर करता है
एक ज़रा सी कश्ती ने ललकारा है
अब देखें क्या ढोंग समंदर करता है
कान लगा कर मौसम की बातें सुनिए
क़ुदरत का सब हाल उजागर करता है
उसकी बातों में रस कैसे पैदा हो
बात बहुत ही सोच-समझकर करता है
जिसको देखो 'दानिश' का दीवाना है
क्या वो कोई जादू-मंतर करता है
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