"जिस्म-एक कमरा"
ये जिस्म
किसी चार दीवारी
कमरे की तरह बँध गया है
जिस
में घुटन
फ़र्श की तरह फैली हुई है
बेचैनी की उस पर
धूल जम गई है
उदासी के जाले
दीवारों पर लटके हुए है
जिन जालों में
ख़ुशी का कोई कीड़ा
फँस भी जाए तो
तेरी यादों के मकड़े
उसे खा जाते है
जिस्म के कमरे में
अब रूह का दम
घुटने लगा है
क्या बस
रूह की किस्मत में
फिर तड़पना लिखा है
और मुहब्बत में
सिर्फ़ बिछड़ना लिखा है
ये आँखें
इस कमरे की
खिड़कियाँ हैं
जिस के शीशों से
मायूसी की
ओस गिरती रहती है
और दिल
इस कमरे का
दरवाज़ा है
जिसे न जाने
कितनी दफ़ा
तोड़ा गया है
फिर भी
दिलासों की
मरम्मत से
ख़ुद को बचाए रक्खा है
जो ज़रा सी
ख़ामोशी के दस्तक पे
टूटने लगता है















