कभी महफ़िल सजाऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
दिलों को गर मिलाऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
मुझे तू ने ख़ुशी ग़म में बुलाया ही नहीं लेकिन
नया मैं घर बसाऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
लगी है एक कमरे में जहाँ तस्वीर दोनों की
उसे जब भी हटाऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
अभी टूटा नहीं है दिल मिरा कुछ ठीक से जाना
इसे जब तोड़ पाऊॅंगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
ग़ज़ल के एक हिस्से में लिखा है नाम भी तेरा
कभी उस को सुनाऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
मुनासिब तो नहीं तेरे यहाँ पर वापसी मेरी
अगर में लौट आऊँगा तुझे पक्का बुलाऊँगा
— Manish watan















