माँ किसी की मचल रही होगी
सिर्फ़ दुख वो निगल रही होगी
जब बुरा ही ख़याल आए तब
ख़्वाब में भी दहल रही होगी
माँ अकेले रहे किसी की जब
नुक्स कोई सफल रही होगी
माँ अगर बंद हो मकानों में
मोम सी ख़ूब जल रही होगी
इब्तिदा में कमी हुई तब माँ
सोचके सिर्फ़ जल रही होगी
रंग कैसे फ़िजा बदलती है
माँ न वैसे बदल रही होगी
ख़्वाब देखा किधर सुहाना था
इसलिए ये ग़ज़ल रही होगी
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