आसमानी पर
हरे भरे शजर वो और कुछ बंदर हैं
बाग़ में इक शाम क्या ख़ूब मंज़र है
सुर्ख़ पौधों को निहारते हुए बैठी है
फूलों को छूते हुए लगे वो रूठी है
शाख़ दर शाख़ बाग़ ख़ूब महकता है
तितलियों सी रंगीन वो भी लगती है
पर उस के शायद अब खुल गए हैं
सरगिरानी भरे हालात बदल गए हैं
एहसास होता है अभी ये मुझ को भी
आसमानी पर जैसे उसे मिल गए हैं
— Manohar Shimpi















