ख़लिशवो ख़्वाब भी टूटे जिन कोअब तक रखा था ज़िंदाअगर अहद-ए-वफ़ा भी न होतो क्यूँ फिर हों हम शर्मिंदाइश्क़ मुहब्बत केहम भी रहे हैं बाशिंदेजब कभी हम मिलते थेख़ूब माज़ी रहा क्या है आइंदाअब सिर्फ़ इक ख़लिश ही तो हैसच होंगे क्या पैमान जो थे पाइंदा— Manohar Shimpi