"परछाई"
वादियों में आवाज़ कुछ तो सुनाई दे रही थी
झरने से पानी बहने की आवाज़ आ रही थी
पत्तों की खड़खड़ाहट भी सुनाई दे रही थी
धीमे-धीमे ठंडी हवा बदन को चूम रही थी
अँधेरे में कभी कोई रौशनी चमक रही थी
ऐसा क्या देखा जो तुम ख़ामोश खड़ी थी
तुम्हारे आँखों में कुछ और दिखाई दे रहा था
कुछ कहने का तुम में होश भी तो नहीं था
तुम्हारे आजू-बाजू भी कोई मौजूद नहीं था
सुना था बरसों पहले वहाँ हादसा हुआ था
कोई और है वहाँ ऐसा आग़ाज़ हो रहा था
ऐसा क्या हुआ था जिस से सन्नाटा छाया था
तुम जो समझ रहे थे वो वाक़ई में मैं नहीं थी
मेरे जैसे शक्ल सूरत सी कोई और खड़ी थी
मैं तो अपने सहेली संग वादियों में घूम रही थी
घूमते फिरते व्यंजनों का ख़ूब आनंद ले रही थी
रूह से रूह तक का सफ़र ये कैसे दस्तरस थी
रूहों का क्या 'मनोहर' कल आपसे संगत की थी















