आरज़ू थी ज़िंदगी हो आइना ख़ुश-अख़्तरी का

बन गया किरदार लेकिन वक़्त की बाज़ी-गरी का

सर सभी के सामने झुकता रहा शर्मिंदगी से
मरते दम तक भी रहा एहसास अपनी कम-तरी का

बुझ गई लौ ज़िंदगी की प्यास फिर भी बुझ न पाई
ख़्वाब अधूरा ही रहा है इक हसीं रश्क-ए-परी का

चुप था जब तक हर सितम पे मोहतशिम था हर नज़र में
जब ज़बाँ खोली लगा इल्ज़ाम आशुफ़्ता-सरी का

क़ाबिल-ए-मौसूक़ मिलते ही नहीं ढूँढे़ से भी अब
है ज़बाँ शीरीं मगर दिल है मकाँ कीना-वरी का

खो गया इक रोज़ आख़िर इस जहाँ की भीड़ में मैं
चाह कर भी रख न पाया पास अपनी ख़ुद-सरी का

छोड़ कर जाता रहा था हर कोई मुझ को 'उमर'
रह गया अरमान दिल में हम-सफ़र की रहबरी का

— Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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