अरमाँ था इक़्तिदार न आली-वक़ार का

चाहा था ज़िंदगी से बस इक पल क़रार का

शर्मिंदगी से उठ न सके फिर कभी भी हम
देना पड़ा हिसाब हमें जब शिआर का

काँटों में ही गुज़र गई अपनी ये ज़िंदगी
मुद्दत हुई है देखे ज़माना बहार का

मजमा था अपने ग़ैर का चारों तरफ़ मगर
बाँटा न ग़म किसी ने भी इस ख़ाकसार का

आँसू भी ढल सके न थे आँखों से उस घड़ी
निकला जुलूस शहर में जब इज़्तिरार का

चैन-ओ-क़रार छू के भी गुज़रे नहीं कभी
गहवारा ही बना रहा दिल ख़लफ़शार का

मिस्कीन की जगह नहीं जब कुछ यहाँ 'उमर'
तो फ़ाइदा ही क्या तेरे इस शाहकार का

— Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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